अब्दुल हमीद आदम की ग़ज़लें Abdul hameed ki ghajal


1. फ़क़ीर किस दर्जा शादमाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

फ़क़ीर किस दर्जा शादमाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा
हुज़ूर किस दर्जा मेहरबाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

वो मय-कदा था सनम-कदा था कि बाब-ए-जन्नत खुले हुए थे
तमाम शब आप हम कहाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

वहाँ बहारों के ज़मज़मे थे वहाँ निगारों के जमगठे थे
वहाँ सितारों के कारवाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

पहन के फूलों के ताज सर पर हसीन-ओ-शादाब मसनदों पर
सुबू-ब-कफ़ कौन हुक्मराँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

मराहिल-ए-राहत-ओ-अमाँ थे मसाइल-ए-माह-ओ-कहकशाँ थे
मशाग़िल-ए-हर्फ़-ओ-दास्ताँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

अगरचे शौक़-ओ-तलब थे बे-साख़्ता हम-आग़ोशियों पे माइल
कई तकल्लुफ़ भी दरमियाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

लतीफ़ शामें तबीअतों के ज़मीर से ख़ूब आश्ना थीं
हसीं सवेरे मिज़ाज-दाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

नज़र की हद तक मुहीत था सिलसिला महकते हुए गुलों का
गुलों में परियों के घर निहाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

अजीब साँचे की कश्तियाँ बह रही थीं लहरों के ज़ेर-ओ-बम पर
अजीब सूरत के बादबाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

उलूहियत आप इस हसीं इत्तिफ़ाक़ पर मुस्कुरा रही थी
सनम ख़ुदाओं के मेहमाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

जो वाक़िए थे वो गूँजते ज़मज़मों के मानिंद मौजज़न थे
जो ख़्वाब थे सर्व-ए-बोस्ताँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

कहीं कहीं सलसबील ओ कौसर की जोत मौजूद थी ज़मीं पर
कहीं कहीं अर्श-ओ-आसमाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा

शब-ए-मोहब्बत हुज़ूर की काकुलों के खुलने के सिलसिले में
'अदम' के इसरार क्या जवाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा


2. बस इस क़दर है ख़ुलासा मिरी कहानी का

बस इस क़दर है ख़ुलासा मिरी कहानी का
कि बन के टूट गया इक हबाब पानी का

मिला है साक़ी तो रौशन हुआ है ये मुझ पर
कि हज़्फ़ था कोई टुकड़ा मिरी कहानी का

मुझे भी चेहरे पे रौनक़ दिखाई देती है
ये मो'जिज़ा है तबीबों की ख़ुश-बयानी का

है दिल में एक ही ख़्वाहिश वो डूब जाने की
कोई शबाब कोई हुस्न है रवानी का

लिबास-ए-हश्र में कुछ हो तो और क्या होगा
बुझा सा एक छनाका तिरी जवानी का

करम के रंग निहायत अजीब होते हैं
सितम भी एक तरीक़ा है मेहरबानी का

'अदम' बहार के मौसम ने ख़ुद-कुशी कर ली
खुला जो रंग किसी जिस्म-ए-अर्ग़वानी का


3. बहुत से लोगों को ग़म ने जिला के मार दिया

बहुत से लोगों को ग़म ने जिला के मार दिया
जो बच रहे थे उन्हें मय पिला के मार दिया

ये क्या अदा है कि जब उन की बरहमी से हम
न मर सके तो हमें मुस्कुरा के मार दिया

न जाते आप तो आग़ोश क्यूँ तही होती
गए तो आप ने पहलू से जा के मार दिया

मुझे गिला तो नहीं आप के तग़ाफ़ुल से
मगर हुज़ूर ने हिम्मत बढ़ा के मार दिया

न आप आस बँधाते न ये सितम होता
हमें तो आप ने अमृत पिला के मार दिया

किसी ने हुस्न-ए-तग़ाफ़ुल से जाँ तलब कर ली
किसी ने लुत्फ़ के दरिया बहा के मार दिया

जिसे भी मैं ने ज़ियादा तपाक से देखा
उसी हसीन ने पत्थर उठा के मार दिया

वो लोग माँगेंगे अब ज़ीस्त किस के आँचल से?
जिन्हें हुज़ूर ने दामन छुड़ा के मार दिया

चले तो ख़ंदा-मिज़ाजी से जा रहे थे हम
किसी हसीन ने रस्ते में आ के मार दिया

रह-ए-हयात में कुछ ऐसे पेच-ओ-ख़म तो न थे
किसी हसीन ने रस्ते में आ के मार दिया

करम की सूरत-ए-अव्वल तो जाँ-गुदाज़ न थी
करम का दूसरा पहलू दिखा के मार दिया

अजीब रस-भरा रहज़न था जिस ने लोगों को
तरह तरह की अदाएँ दिखा के मार दिया

अजीब ख़ुल्क़ से इक अजनबी मुसाफ़िर ने
हमें ख़िलाफ़-ए-तवक़्क़ो बुला के मार दिया

'अदम' बड़े अदब-आदाब से हसीनों ने
हमें सितम का निशाना बना के मार दिया

तअ'य्युनात की हद तक तो जी रहा था 'अदम'
तअ'य्युनात के पर्दे उठा के मार दिया



4. बातें तेरी वो वो फ़साने तेरे

बातें तेरी वो वो फ़साने तेरे
शगुफ़्ता शगुफ़्ता बहाने तेरे

बस एक ज़ख़्म नज़्ज़ारा हिस्सा मेरा
बहारें तेरी आशियाने तेरे

बस एक दाग़-ए-सज्दा मेरी क़ायनात
जबीनें तेरी आस्ताने तेरे

ज़मीर-ए-सदफ़ में किरन का मुक़ाम
अनोखे अनोखे ठिकाने तेरे

फ़क़ीरों का जमघट घड़ी दो घड़ी
शराबें तेरी बादाख़ाने तेरे

बहार-ओ-ख़िज़ाँ कम निगाहों के वहम
बुरे या भले सब ज़माने तेरे

'अदम' भी है तेरा हिकायतकदाह
कहाँ तक गये हैं फ़साने तेरे


5. बे-जुम्बिश-ए-अब्रू तो नहीं काम चलेगा

बे-जुम्बिश-ए-अब्रू तो नहीं काम चलेगा
आ कर मिरे क़िस्से में तिरा नाम चलेगा

ठहरा है मिरे ज़ेहन में जो क़ाफ़िला-ए-गुल
थोड़ा सा तो ले कर यहाँ आराम चलेगा

ज़ुहहाद की माला नहीं जो रात को निकले
रिंदों का पियाला है सर-ए-शाम चलेगा

तू रक़्स करे गिर्द मिरे और मैं गाऊँ
ये खेल भी ऐ गर्दिश-ए-अय्याम चलेगा

छुप छुप के जो आता है अभी मेरी गली में
इक रोज़ मिरे साथ सर-ए-आम चलेगा


6. बे-सबब क्यूँ तबाह होता है

बे-सबब क्यूँ तबाह होता है
फ़िक्र-ए-फ़र्दा गुनाह होता है

तुझ को क्या दूसरों के ऐबों से
क्यूँ अबस रू-सियाह होता है

मुझ को तन्हा न छोड़ कर जाओ
ये ख़ला बे-पनाह होता है

ज़क उसी से बहुत पहुँचती है
जो मिरा ख़ैर-ख़्वाह होता है

उस घड़ी उस से माँग लो सब कुछ
जब 'अदम' बादशाह होता है



7. भूली-बिसरी बातों से क्या तश्कील-ए-रूदाद करें

भूली-बिसरी बातों से क्या तश्कील-ए-रूदाद करें
हम को तो कुछ याद नहीं है आप ही कुछ इरशाद करें

पहले-पहल जब आप का जोबन इतना शहर-आशोब न था
इक मुश्ताक़ से सादा-दिल इंसाँ की परस्तिश याद करें

आप से मुमकिन है दिल-जूई यज़्दाँ की ये रीत नहीं
जिस को सुन कर चुप रहना है उस से क्या फ़रियाद करें

इश्क़ ने सौंपा है काम अपना अब तो निभाना ही होगा
मैं भी कुछ कोशिश करता हूँ आप भी कुछ इमदाद करें

जुज़्व-ए-तबीअ'त बन जाएँ तो जौर करम हो जाते हैं
लुत्फ़ न अब राइज फ़रमाएँ सिर्फ़ सितम ईजाद करें


8. भूले से कभी ले जो कोई नाम हमारा

भूले से कभी ले जो कोई नाम हमारा
मर जाए ख़ुशी से दिल-ए-नाकाम हमारा

ले जाती है उस सम्त हमें गर्दिश-ए-दौराँ
ऐ दोस्त ख़राबात से क्या काम हमारा

कर लेते हैं तख़्लीक़ कोई वज्ह-ए-अज़िय्यत
भाता नहीं ख़ुद हम को भी आराम हमारा

ऐ गर्दिश-ए-दौराँ ये कोई सोच की रुत है
कम-बख़्त अभी दौर में है जाम हमारा

इस बार तो आया था इधर क़ासिद-ए-जाँ ख़ुद
सरकार को पहुँचा नहीं पैग़ाम हमारा

पहुँचाई है तकलीफ़ बहुत पहले ही तुझ को
ऐ राह-नुमा हाथ न अब थाम हमारा

ऐ क़ाफ़िला-ए-होश गँवा वक़्त न अपना
पड़ता नहीं कुछ ठीक अभी गाम हमारा

देखा है हरम तेरा मगर हाए-रे ज़ाहिद
महका हुआ वो कूचा-ए-असनाम हमारा

ग़िलमान भी जन्नत के बड़ी चीज़ हैं लेकिन
तौबा मिरी वो साक़ी-ए-गुलफ़ाम हमारा

गुल नौहा-कुनाँ ओ सनम-ए-दस्त-ब-सीना
अल्लाह ग़नी! लम्हा-ए-अंजाम हमारा

कर बैठे हैं हम भूल के तौबा जो सहर को
शीशे को तआ'क़ुब है सर-ए-शाम हमारा

मय पीना 'अदम' और क़दम चूमना उन के
है शग़्ल यही अब सहर-ओ-शाम हमारा



9. मतलब मुआ'मलात का कुछ पा गया हूँ मैं

मतलब मुआ'मलात का कुछ पा गया हूँ मैं
हँस कर फ़रेब-ए-चश्म-ए-करम खा गया हूँ मैं

बस इंतिहा है छोड़िए बस रहने दीजिए
ख़ुद अपने ए'तिमाद से शर्मा गया हूँ मैं

साक़ी ज़रा निगाह मिला कर तो देखना
कम्बख़्त होश में तो नहीं आ गया हूँ मैं

शायद मुझे निकाल के पछता रहे हों आप
महफ़िल में इस ख़याल से फिर आ गया हूँ मैं

क्या अब हिसाब भी तू मिरा लेगा हश्र में
क्या ये इ'ताब कम है यहाँ आ गया हूँ मैं

मैं इश्क़ हूँ मिरा भला क्या काम दार से
वो शरअ' थी जिसे वहाँ लटका गया हूँ मैं

निकला था मय-कदे से कि अब घर चलूँ 'अदम'
घबरा के सू-ए-मय-कदा फिर आ गया हूँ मैं


10. मय-कदा था चाँदनी थी मैं न था

मय-कदा था चाँदनी थी मैं न था
इक मुजस्सम बे-ख़ुदी थी मैं न था

इश्क़ जब दम तोड़ता था तुम न थे
मौत जब सर धुन रही थी मैं न था

तूर पर छेड़ा था जिस ने आप को
वो मिरी दीवानगी थी मैं न था

वो हसीं बैठा था जब मेरे क़रीब
लज़्ज़त-हम-सायगी थी मैं न था

मय-कदे के मोड़ पर रुकती हुई
मुद्दतों की तिश्नगी थी मैं न था

थी हक़ीक़त कुछ मिरी तो इस क़दर
उस हसीं की दिल-लगी थी मैं न था

मैं और उस ग़ुंचा-दहन की आरज़ू
आरज़ू की सादगी थी मैं न था

जिस ने मह-पारों के दिल पिघला दिए
वो तो मेरी शाएरी थी मैं न था

गेसुओं के साए में आराम-कश
सर-बरहना ज़िंदगी थी मैं न था

दैर ओ काबा में 'अदम' हैरत-फ़रोश
दो-जहाँ की बद-ज़नी थी मैं न था



11. मय-ख़ाना-ए-हस्ती में अक्सर हम अपना ठिकाना भूल गए

मय-ख़ाना-ए-हस्ती में अक्सर हम अपना ठिकाना भूल गए
या होश में जाना भूल गए या होश में आना भूल गए

अस्बाब तो बन ही जाते हैं तक़दीर की ज़िद को क्या कहिए
इक जाम तो पहुँचा था हम तक हम जाम उठाना भूल गए

आए थे बिखेरे ज़ुल्फ़ों को इक रोज़ हमारे मरक़द पर
दो अश्क तो टपके आँखों से दो फूल चढ़ाना भूल गए

चाहा था कि उन की आँखों से कुछ रंग-ए-बहाराँ ले लीजे
तक़रीब तो अच्छी थी लेकिन दो आँख मिलाना भूल गए

मालूम नहीं आईने में चुपके से हँसा था कौन 'अदम'
हम जाम उठाना भूल गए वो साज़ बजाना भूल गए



12. मिरा इख़्लास भी इक वज्ह-ए-दिल-आज़ारी है

मिरा इख़्लास भी इक वज्ह-ए-दिल-आज़ारी है
बंदा-परवर मुझे एहसास-ए-गुनहगारी है

आप अज़िय्यत का बनाते हैं जो ख़ूगर मुझ को
इस से बेहतर भला क्या सूरत-ए-ग़म-ख़्वारी है

महज़ तस्कीन-बरआरी के बहाने हैं सब
मैं तो कहता हूँ मोहब्बत भी रिया-कारी है

मश्क़ करता है नसीहत की जिन अय्याम में तू
वाइज़-ए-शहर वही मौसम-ए-मय-ख़्वारी है

कैसे आएगा न सर-दर्द को आराम 'अदम'
मेरे अहबाब को तक़रीर की बीमारी है


13. मुझ से चुनाँ-चुनीं न करो मैं नशे मैं हूँ

मुझ से चुनाँ-चुनीं न करो मैं नशे मैं हूँ
मैं जो कहूँ नहीं न करो मैं नशे में हूँ

इंसाँ नशे में हो तो वो छुपता नहीं कभी
हर-चंद तुम यक़ीं न करो मैं नशे में हूँ

ये वक़्त है फ़राख़-दिली के सुलूक का
तंग अपनी आस्तीं न करो मैं नशे में हूँ

बे-इख़्तियार चूम न लूँ मैं कहीं इन्हें
आँखों को ख़शमगीं न करो मैं नशे में हूँ

हर-चंद मेरे हक़ में है ये रहमत-ए-ख़ुदा
आँचल मिरे क़रीं न करो मैं नशे में हूँ

नश्शे में सुर्ख़ रंग तही-अज़-ख़तर नहीं?
होंटों को अहमरीं न करो मैं नशे में हूँ

देखो मैं कह रहा हूँ तुम्हें पय-ब-पय 'अदम'
मुझ को बहुत हज़ीं न करो मैं नशे में हूँ


14. मुश्किल ये आ पड़ी है कि गर्दिश में जाम है

मुश्किल ये आ पड़ी है कि गर्दिश में जाम है
ऐ होश वर्ना मुझ को तिरा एहतिराम है

फ़ुर्सत का वक़्त ढूँढ के मिलना कभी अजल
तुझ को भी काम है अभी मुझ को भी काम है

आती बहुत क़रीब से ख़ुश्बू है यार की
जारी इधर उधर ही कहीं दौर-ए-जाम है

कुछ ज़हर को तरसते हैं कुछ मय में ग़र्क़ हैं
साक़ी ये तेरी बज़्म का क्या इंतिज़ाम है

मय और हराम? हज़रत-ए-ज़ाहिद ख़ुदा का ख़ौफ़
वो तो कहा गया था कि मस्ती हराम है

ऐ ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं ज़रा लहरा के फैलना
इक रात इस चमन में मिरा भी क़याम है

ऐ ज़िंदगी तू आप ही चुपके से देख ले
जाम-ए-अदम पे लिक्खा हुआ किस का नाम है


15. मुस्कुरा कर ख़िताब करते हो

मुस्कुरा कर ख़िताब करते हो
आदतें क्यूँ ख़राब करते हो

मार दो मुझ को रहम-दिल हो कर
क्या ये कार-ए-सवाब करते हो

मुफ़्लिसी और किस को कहते हैं!
दौलतों का हिसाब करते हो

सिर्फ़ इक इल्तिजा है छोटी सी
क्या उसे बारयाब करते हो

हम तो तुम को पसंद कर बैठे
तुम किसे इंतिख़ाब करते हो

ख़ार की नोक को लहू दे कर
इंतिज़ार-ए-गुलाब करते हो

ये नई एहतियात देखी है
आइने से हिजाब करते हो

क्या ज़रूरत है बहस करने की
क्यूँ कलेजा कबाब करते हो

हो चुका जो हिसाब होना था
और अब क्या हिसाब करते हो

एक दिन ऐ 'अदम' न पी तो क्या
रोज़ शग़्ल-ए-शराब करते हो

कितने बे-रहम हो 'अदम' तुम भी
ज़िक्र-ए-अहद-ए-शबाब करते हो

हो किसी की ख़ुशी गर इस में 'अदम'
जुर्म का इर्तिकाब करते हो


16. मुंक़लिब सूरत-ए-हालात भी हो जाती है

मुंक़लिब सूरत-ए-हालात भी हो जाती है
दिन भले हों तो करामात भी हो जाती है

हुस्न को आता है जब अपनी ज़रूरत का ख़याल
इश्क़ पर लुत्फ़ की बरसात भी हो जाती है

दैर ओ काबा ही इस का न तअ'ल्लुक़ समझो
ज़िंदगी है ये ख़राबात भी हो जाती है

जब्र से ताअत-ए-यज़्दाँ भी है बार-ए-ख़ातिर
प्यार से आदत-ए-ख़िदमात भी हो जाती है

दावर-ए-हश्र मुझे अपना मुसाहिब न समझ
बाज़ औक़ात खरी बात भी हो जाती है

हश्र में ले के चलो मुतरिब ओ माशूक़ ओ सुबू
ग़ैर के घर में कभी रात भी हो जाती है

बाज़ औक़ात किसी और के मिलने से 'अदम'
अपनी हस्ती से मुलाक़ात भी हो जाती है


17. मोहतात ओ होशियार तो बे-इंतिहा हूँ मैं

मोहतात ओ होशियार तो बे-इंतिहा हूँ मैं
अमदन तिरा फ़रेब-ए-नज़र खा गया हूँ मैं

क्या ये सुबूत कम नहीं मेरी वफ़ाओं का
मैं आप कह रहा हूँ बहुत बेवफ़ा हूँ मैं

ऐसे गिरा हूँ तेरी ख़ुदाई के सामने
महसूस हो रहा है ख़ुदा हो गया हूँ मैं

मेरे सुकूत को मिरी आवाज़ मत समझ
इस पैरहन में तेरे सितम की सदा हूँ मैं

ये इंतिहा है मेरे अदब की कि ऐ 'अदम'
उस का वजूद हो के भी उस से जुदा हूँ मैं


18. ये कैसी सरगोशी-ए-अज़ल साज़-ए-दिल के पर्दे हिला रही है

ये कैसी सरगोशी-ए-अज़ल साज़-ए-दिल के पर्दे हिला रही है
मिरी समाअत खनक रही है कि तेरी आवाज़ आ रही है

हवादिस-ए-रोज़गार मेरी ख़ुशी से क्या इंतिक़ाम लेंगे
कि ज़िंदगी वो हसीन ज़िद है कि बे-सबब मुस्कुरा रही है

तिरा तबस्सुम फ़रोग़-ए-हस्ती तिरी नज़र ए'तिबार-ए-मस्ती
बहार इक़रार कर रही है शराब ईमान ला रही है

फ़साना-ख़्वाँ देखना शब-ए-ज़िंदगी का अंजाम तो नहीं है
कि शम्अ के साथ रफ़्ता रफ़्ता मुझे भी कुछ नींद आ रही है

अगर कोई ख़ास चीज़ होती तो ख़ैर दामन भिगो भी लेते
शराब से तो बहुत पुराने मज़ाक़ की बास आ रही है

ख़िरद के टूटे हुए सितारे 'अदम' कहाँ तक चराग़ बनते
जुनूँ की रौशन रविश है आख़िर दिलों को रस्ते दिखा रही है


रक़्स करता हूँ ज


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