अब्दुल हमीद आदम की ग़ज़ल Abdul hameed ki ghazale

1. उन को अहद-ए-शबाब में देखा

उन को अहद-ए-शबाब में देखा
चाँदनी को शराब में देखा

आँख का ए'तिबार क्या करते
जो भी देखा वो ख़्वाब में देखा

दाग़ सा माहताब में पाया
ज़ख़्म सा आफ़्ताब में देखा

जाम ला कर क़रीब आँखों के
आप ने कुछ शराब में देखा

किस ने छेड़ा था साज़-ए-मस्ती को?
एक शो'ला रुबाब में देखा

लोग कुछ मुतमइन भी थे फिर भी
जिस को देखा अज़ाब में देखा

हिज्र की रात सो गए थे 'अदम'
सुब्ह-ए-महशर को ख़्वाब में देखा


2. एक ना-मक़बूल क़ुर्बानी हूँ मैं

एक ना-मक़बूल क़ुर्बानी हूँ मैं
सर-फिरी उल्फ़त में ला-सानी हूँ मैं

मैं चला जाता हूँ वाँ तकलीफ़ से
वो समझते हैं कि ला-सानी हूँ मैं

कान धरते ही नहीं वो बात पर
कब से मसरूफ़-ए-सना-ख़्वानी हूँ मैं

ज़िंदगी है इक किराए की ख़ुशी
सूखते तालाब का पानी हूँ मैं

मुझ से बढ़ कर क्या कोई होगा अमीर
क़ीमती विर्से की अर्ज़ानी हूँ मैं

चाँदनी रातों में यारों के बग़ैर
चाँदनी रातों की वीरानी हूँ मैं

कहना सुनना उन से मुझ को कुछ नहीं
सिर्फ़ इक तम्हीद-ए-तूलानी हूँ मैं

मुझ को पछताना नहीं आता 'अदम'
एक दौलत-मंद नादानी हूँ मैं


3.  ऐ यार-ए-ख़ुश ख़राम ज़माना ख़राब है

ऐ यार-ए-ख़ुश ख़राम ज़माना ख़राब है
हर कुन्ज में है दाम ज़माना ख़राब है

मलबूस ज़द में है हवास की जवान परी
क्या शेख़ क्या इमाम ज़माना ख़राब है

उड़ती हैं सूफ़ियों के लिबादों में बोतलें
अरबाब-ए-इन्तज़ाम ज़माना ख़राब है

सैर-ए-चमन को गेसू-ए-मुश्कीं बिख़ेर कर
जाओ न वक्त-ए-शाम ज़माना ख़राब है

कह तो रहा हूँ उनसे बड़ी देर से ‘अदम‘
कर लो यहीं क़याम ज़माना ख़राब है


4. ऐ साक़ी-ए-मह-वश ग़म-ए-दौराँ नहीं उठता

ऐ साक़ी-ए-मह-वश ग़म-ए-दौराँ नहीं उठता
दरवेश के हुजरे से ये मेहमाँ नहीं उठता

कहते थे कि है बार-ए-दो-आलम भी कोई चीज़
देखा है तो अब बार-ए-गरेबाँ नहीं उठता

क्या मेरे सफ़ीने ही की दरिया को खटक थी
क्या बात है अब क्यूँ कोई तूफ़ाँ नहीं उठता

किस नक़्श-ए-क़दम पर है झुका रोज़-ए-अज़ल से
किस वहम में सज्दे से बयाबाँ नहीं उठता

बे-हिम्मत-ए-मर्दाना मसाफ़त नहीं कटती
बे-अज़्म-ए-मुसम्मम क़दम आसाँ नहीं उठता

यूँ उठती हैं अंगड़ाई को वो मरमरीं बाँहें
जैसे कि 'अदम' तख़्त-ए-सुलैमाँ नहीं उठता


5. कश्ती चला रहा है मगर किस अदा के साथ

कश्ती चला रहा है मगर किस अदा के साथ
हम भी न डूब जाएँ कहीं ना-ख़ुदा के साथ

दिल की तलब पड़ी है तो आया है याद अब
वो तो चला गया था किसी दिलरुबा के साथ

जब से चली है आदम ओ यज़्दाँ की दास्ताँ
हर बा-वफ़ा का रब्त है इक बेवफ़ा के साथ

मेहमान मेज़बाँ ही को बहका के ले उड़ा
ख़ुश्बू-ए-गुल भी घूम रही है सबा के साथ

पीर-ए-मुग़ाँ से हम को कोई बैर तो नहीं
थोड़ा सा इख़्तिलाफ़ है मर्द-ए-ख़ुदा के साथ

शैख़ और बहिश्त कितने तअ'ज्जुब की बात है
या-रब ये ज़ुल्म ख़ुल्द की आब-ओ-हवा के साथ

पढ़ता नमाज़ मैं भी हूँ पर इत्तिफ़ाक़ से
उठता हूँ निस्फ़ रात को दिल की सदा के साथ

महशर का ख़ैर कुछ भी नतीजा हो ऐ 'अदम'
कुछ गुफ़्तुगू तो खुल के करेंगे ख़ुदा के साथ


6. कितनी बे-साख़्ता ख़ता हूँ मैं

कितनी बे-साख़्ता ख़ता हूँ मैं
आप की रग़बत-ओ-रज़ा हूँ मैं

मैं ने जब साज़ छेड़ना चाहा
ख़ामुशी चीख़ उठी सदा हूँ मैं

हश्र की सुब्ह तक तो जागूँगा
रात का आख़िरी दिया हूँ मैं

आप ने मुझ को ख़ूब पहचाना
वाक़ई सख़्त बेवफ़ा हूँ मैं

मैं ने समझा था मैं मोहब्बत हूँ
मैं ने समझा था मुद्दआ' हूँ मैं

काश मुझ को कोई बताए 'अदम'
किस परी-वश की बद-दुआ हूँ मैं



7. क्या बात है ऐ जान-ए-सुख़न बात किए जा

क्या बात है ऐ जान-ए-सुख़न बात किए जा
माहौल पे नग़्मात की बरसात किए जा

दुनिया की निगाहों में बड़ी हिर्स भरी है
ना-अहल ज़माने से हिजाबात किए जा

नेकी का इरादा है तो फिर पूछना कैसा
दिन रात फ़क़ीरों की मुदारात किए जा

चलते रहें मदहोश पियालों की रविश पर
नादान सितारों को हिदायात किए जा

अल्लाह तिरा हुस्न करे और ज़ियादा
हम राह-नशीनों से मुलाक़ात किए जा

बन आए जवाबात तो मिल जाएँगे ख़ुद ही
ऐ दावर-ए-महशर तू सवालात किए जा

हस्ती ओ अदम क्या हैं ब-जुज़ जुम्बिश-ए-अबरू
ऐ जान-ए-किनायात इशारात किए जा

कहता है 'अदम' मुझ को हर इक गोशा-ए-हस्ती
आया है तो कुछ सैर-ए-ख़राबात किए जा



8. खुली वो ज़ुल्फ़ तो पहली हसीन रात हुई

खुली वो ज़ुल्फ़ तो पहली हसीन रात हुई
उठी वो आँख तो तख़लीक़-ए-काएनात हुई

ख़ुदा ने गढ़ तो दिया आलम-ए-वजूद मगर
सजावटों की बिना औरतों की ज़ात हुई

गिले बहुत थे मगर जब नज़र नज़र से मिली!
न मुझ से बात हुई और न उन से बात हुई

दिल-ए-तबाह को कुछ और कर गई ज़ख़्मी!
वो इक निगाह जो लबरेज़-ए-इल्तिफ़ात हुई

हयात ओ मौत की ग़ारत-गरी का हाल न पूछ
जो मौत न बन सकी वो 'अदम' हयात हुई


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