अब्दुल हमीद आदम की गजलें, abdul hameed aadam

1. ख़ाली है अभी जाम मैं कुछ सोच रहा हूँ

ख़ाली है अभी जाम मैं कुछ सोच रहा हूँ
ऐ गर्दिश-ए-अय्याम मैं कुछ सोच रहा हूँ

साक़ी तुझे इक थोड़ी सी तकलीफ़ तो होगी
साग़र को ज़रा थाम मैं कुछ सोच रहा हूँ

पहले बड़ी रग़बत थी तिरे नाम से मुझ को
अब सुन के तिरा नाम मैं कुछ सोच रहा हूँ

इदराक अभी पूरा तआ'वुन नहीं करता
दय बादा-ए-गुलफ़ाम मैं कुछ सोच रहा हूँ

हल कुछ तो निकल आएगा हालात की ज़िद का
ऐ कसरत-ए-आलाम मैं कुछ सोच रहा हूँ

फिर आज 'अदम' शाम से ग़मगीं है तबीअ'त
फिर आज सर-ए-शाम मैं कुछ सोच रहा हूँ


2. ख़ुश हूँ कि ज़िंदगी ने कोई काम कर दिया

ख़ुश हूँ कि ज़िंदगी ने कोई काम कर दिया
मुझ को सुपुर्द-ए-गर्दिश-ए-अय्याम कर दिया

साक़ी सियाह-ख़ाना-ए-हस्ती में देखना
रौशन चराग़ किस ने सर-ए-शाम कर दिया

पहले मिरे ख़ुलूस को देते रहे फ़रेब
आख़िर मिरे ख़ुलूस को बदनाम कर दिया

कितनी दुआएँ दूँ तिरी ज़ुल्फ़-ए-दराज़ को
कितना वसीअ सिलसिला-ए-दाम कर दिया

वो चश्म-ए-मस्त कितनी ख़बर-दार थी 'अदम'
ख़ुद होश में रही हमें बदनाम कर दिया



3.  ख़ैरात सिर्फ़ इतनी मिली है हयात से

ख़ैरात सिर्फ़ इतनी मिली है हयात से
पानी की बूँद जैसे अता हो फ़ुरात से

शबनम इसी जुनूँ में अज़ल से है सीना-कूब
ख़ुर्शीद किस मक़ाम पे मिलता है रात से

नागाह इश्क़ वक़्त से आगे निकल गया
अंदाज़ा कर रही है ख़िरद वाक़िआत से

सू-ए-अदब न ठहरे तो दें कोई मशवरा
हम मुतमइन नहीं हैं तिरी काएनात से

साकित रहें तो हम ही ठहरते हैं बा-क़ुसूर
बोलें तो बात बढ़ती है छोटी सी बात से

आसाँ-पसंदियों से इजाज़त तलब करो
रस्ता भरा हुआ है 'अदम' मुश्किलात से



4.  गिरते हैं लोग गर्मी-ए-बाज़ार देख कर

गिरते हैं लोग गर्मी-ए-बाज़ार देख कर
सरकार देख कर मिरी सरकार देख कर

आवारगी का शौक़ भड़कता है और भी
तेरी गली का साया-ए-दीवार देख कर

तस्कीन-ए-दिल की एक ही तदबीर है फ़क़त
सर फोड़ लीजिए कोई दीवार देख कर

हम भी गए हैं होश से साक़ी कभी कभी
लेकिन तिरी निगाह के अतवार देख कर

क्या मुस्तक़िल इलाज किया दिल के दर्द का
वो मुस्कुरा दिए मुझे बीमार देख कर

देखा किसी की सम्त तो क्या हो गया 'अदम'
चलते हैं राह-रौ सर-ए-बाज़ार देख कर


5. गिरह हालात में क्या पड़ गई है

गिरह हालात में क्या पड़ गई है
नज़र इक महज़बीं से लड़ गई है

निकालें दिल से कैसे उस नज़र को
जो दिल में तीर बनकर गड़ गई है

मुहव्बत की चुभन है क़्ल्बो-जाँ में
कहाँ तक इस मरज़ की जड़ गई है

ज़रा आवाज़ दो दारो-रसन को
जवानी अपनी ज़िद्द पे अड़ गई है

हमें क्या इल्म था ये हाल होगा
"अदम" साहब मुसीबत पड़ गई है


6.  गुनाह-ए-जुरअत-ए-तदबीर कर रहा हूँ मैं

गुनाह-ए-जुरअत-ए-तदबीर कर रहा हूँ मैं
ये किस क़िमाश की तक़्सीर कर रहा हूँ मैं

मैं जानता हूँ अलामत है ज़ोफ़ हिम्मत की
जिसे नसीब से ता'बीर कर रहा हूँ मैं

अभी तदब्बुर-ओ-तदबीर का नहीं मौक़ा'
अभी हिमायत-ए-तक़दीर कर रहा हूँ मैं

हुजूम-ए-हश्र में खोलूँगा अद्ल का दफ़्तर
अभी तो फ़ैसले तहरीर कर रहा हूँ मैं

जवाब देने की आदत नहीं ख़ुदा को अगर
तो क्या परस्तिश-ए-तस्वीर कर रहा हूँ मैं

तबाह हो के हक़ाएक़ के खुरदुरे-पन से
तसव्वुरात की ता'मीर कर रहा हूँ मैं

ख़ुदा के आगे 'अदम' ज़िक्र-ए-अज़्मत-ए-इंसाँ
ग़लत मक़ाम पे तक़रीर कर रहा हूँ मैं


7. गो तिरी ज़ुल्फ़ों का ज़िंदानी हूँ मैं

गो तिरी ज़ुल्फ़ों का ज़िंदानी हूँ मैं
भूल मत जाना कि सैलानी हूँ मैं

ज़िंदगी की क़ैद कोई क़ैद है
सूखते तालाब का पानी हूँ मैं

चाँदनी रातों में यारों के बग़ैर
चाँदनी रातों की वीरानी हूँ मैं

जिस क़दर मौजूद हूँ मफ़क़ूद हूँ
जिस क़दर ग़ाएब हूँ लाफ़ानी हूँ मैं

मुझ को तन्हाई में सुनना बैठ कर
मुतरिब-ए-लम्हात-ए-वजदानी हूँ मैं

जिस क़दर करता हूँ अंदेशा 'अदम'
उस क़दर तस्वीर-ए-हैरानी हूँ मैं

अक़्ल से क्या काम मुझ नाचीज़ का
एक मा'मूली सी नादानी हूँ मैं

हूँ अगर तो हूँ भी क्या इस के सिवा
क़ीमती विर्से की अर्ज़ानी हूँ मैं

दिल की धड़कन बढ़ती जाती है 'अदम'
किस हसीं के ज़ेर-ए-निगरानी हूँ मैं

8. गोरियों कालियों ने मार दिया

गोरियों कालियों ने मार दिया
जामुनों वालियों ने मार दिया

अंग हैं या रिकाबियॉं धन की
मोहनी थालियों ने मार दिया

गुनगुनाते हसीन कानों की
डोलती बालियों ने मार दिया

ऊदे ऊदे सहाब से आँचल
रंग की जालियों ने मार दिया

ज़ुल्फ़ की निकहतों ने जाँ ले ली
होंट की लालियों ने मार दिया

उफ़ वो प्यासे मोअज़्ज़ेज़ीन जिन्हें
रस-भरी गालियों ने मार दिया

झूमती डालियों से जिस्म 'अदम'
झूमती डालियों ने मार दिया


9.  ग़म-ए-मोहब्बत सता रहा है ग़म-ए-ज़माना मसल रहा है

ग़म-ए-मोहब्बत सता रहा है ग़म-ए-ज़माना मसल रहा है
मगर मिरे दिन गुज़र रहे हैं मगर मिरा वक़्त टल रहा है

वो अब्र आया वो रंग बरसे वो कैफ़ जागा वो जाम खनके
चमन में ये कौन आ गया है तमाम मौसम बदल रहा है

मिरी जवानी के गर्म लम्हों पे डाल दे गेसुओं का साया
ये दोपहर कुछ तो मो'तदिल हो तमाम माहौल जल रहा है

ये भीनी भीनी सी मस्त ख़ुश्बू ये हल्की हल्की सी दिल-नशीं बू
यहीं कहीं तेरी ज़ुल्फ़ के पास कोई परवाना जल रहा है

न देख ओ मह-जबीं मिरी सम्त इतनी मस्ती-भरी नज़र से
मुझे ये महसूस हो रहा है शराब का दौर चल रहा है

'अदम' ख़राबात की सहर है कि बारगाह-ए-रुमूज़-ए-हस्ती
इधर भी सूरज निकल रहा है उधर भी सूरज निकल रहा है



10. छेड़ो तो उस हसीन को छेड़ो जो यार हो

छेड़ो तो उस हसीन को छेड़ो जो यार हो
ऐसी ख़ता करो जो अदब में शुमार हो

बैठी है तोहमतों में वफ़ा यूँ घिरी हुई
जैसे किसी हसीन की गर्दन में बार हो

दिन रात मुझ पे करते हो कितने हसीन ज़ुल्म
बिल्कुल मिरी पसंद के मुख़्तार-ए-कार हो

कितने उरूज पर भी हो मौसम बहार का
है फूल सिर्फ़ वो जो सर-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार हो

इक सच्चा प्यार ही नहीं बस यार ऐ 'अदम'
जाँ वार दो अगर कोई झूटा भी यार हो


11. जब गर्दिशों में जाम थे

जब गर्दिशों में जाम थे
कितने हसीं अय्याम थे

हम ही न थे रुसवा फ़क़त
वो आप भी बदनाम थे

कहते हैं कुछ अर्सा हुआ
क़ाबे में भी असनाम थे

अंजाम की क्या सोचते
ना-वाक़िफ़-ए- अंजाम थे

अहद-ए-जवानी में 'अदम'
सब लोग गुलअन्दां थे


12. जब तिरे नैन मुस्कुराते हैं

जब तिरे नैन मुस्कुराते हैं
ज़ीस्त के रंज भूल जाते हैं

क्यूँ शिकन डालते हो माथे पर
भूल कर आ गए हैं जाते हैं

कश्तियाँ यूँ भी डूब जाती हैं
नाख़ुदा किस लिए डराते हैं

इक हसीं आँख के इशारे पर
क़ाफ़िले राह भूल जाते हैं



13.  जहाँ वो ज़ुल्फ़-ए-बरहम कारगर महसूस होती है

जहाँ वो ज़ुल्फ़-ए-बरहम कारगर महसूस होती है
वहाँ ढलती हुई हर दोपहर महसूस होती है

वही शय मक़सद-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र महसूस होती है
कमी जिस की बराबर उम्र भर महसूस होती है

जतन भी क्या हसीं सूझा है तुझ को प्यार करने का
तिरी सूरत मुझे अपनी नज़र महसूस होती है

गली कूचों में सेहन-ए-मय-कदा का रंग होता है
मुझे दुनिया तिरा कैफ़-ए-नज़र महसूस होती है

ज़रा आगे चलोगे तो इज़ाफ़ा इल्म में होगा
मोहब्बत पहले पहले बे-ज़रर महसूस होती है

ये दो पत्थर न जाने कब से आपस में हैं वाबस्ता
जबीं अपनी तुम्हारा संग-ए-दर महसूस होती है

कभी सच तो नहीं उस आँख ने बोला मगर फिर भी
रवय्ये में निहायत मो'तबर महसूस होती है

अदम अब दोस्तों की बे-रुख़ी की है ये कैफ़िय्यत
खटकती तो नहीं इतनी मगर महसूस होती है


14. जिस वक़्त भी मौज़ूँ सी कोई बात हुई है

जिस वक़्त भी मौज़ूँ सी कोई बात हुई है
माहौल से नग़्मात की बरसात हुई है

मय-ख़ाने में है शब के गुज़रने का ये आलम
महसूस ये होता है अभी रात हुई है

है अरसा-ए-महशर भी कोई कुंज-ए-गुलिस्ताँ!
देखो तो कहाँ उन से मुलाक़ात हुई है

ये देख कि किस हाल में हम ज़िंदा हैं अब तक
मत पूछ कि कैसे बसर-औक़ात हुई है

इम्काँ निकल आए हैं 'अदम' सुल्ह के कुछ कुछ
कल शब ग़म-ए-हस्ती से मिरी बात हुई है



15. जुम्बिश-ए-काकुल-ए-महबूब से दिन ढलता है

जुम्बिश-ए-काकुल-ए-महबूब से दिन ढलता है
हाए किस ख़ूबी-ए-उस्लूब से दिन ढलता है

फेंक कुल्फ़त-ज़दा सूरज पे भी छींटे उस के
जिस मय-ए-दिलकश-ओ-मर्ग़ूब से दिन ढलता है

कोशिश-ए-बंदा-ए-दाना नहीं कामिल होती
सोहबत-ए-बंदा-ए-मज्ज़ूब से दिन ढलता है

मेहर के वलवला-ए-रास्त से पौ फटती है
मेहर के जज़्बा-ए-मक़्लूब से दिन ढलता है

साक़िया एक 'अदम' को भी फुरेरी उस की
जिस खनकते हुए मशरूब से दिन ढलता है


16.  जो भी तेरे फ़क़ीर होते हैं

जो भी तेरे फ़क़ीर होते हैं
आदमी बे-नज़ीर होते हैं

तेरी महफ़िल में बैठने वाले
कितने रौशन-ज़मीर होते हैं

फूल दामन में चंद ले लीजे
रास्ते में फ़क़ीर होते हैं

जो परिंदे की आँख रखते हैं
सब से पहले असीर होते हैं

देखने वाला इक नहीं मिलता
आँख वाले कसीर होते हैं

जिन को दौलत हक़ीर लगती है
उफ़ वो कितने अमीर होते हैं

जिन को क़ुदरत ने हुस्न बख़्शा हो
क़ुदरतन कुछ शरीर होते हैं

है ख़ुशी भी अजीब शय लेकिन
ग़म बड़े दिल-पज़ीर होते हैं

ऐ 'अदम' एहतियात लोगों से
लोग मुनकिर-नकीर होते हैं


17.  जो लोग जान बूझ के नादान बन गए

जो लोग जान बूझ के नादान बन गए
मेरा ख़्याल है कि वो इन्सान बन गए

हम हश्र में गए मगर कुछ न पूछिए
वो जान बूझ कर वहाँ अनजान बन गए

हँसते हैं हम को देख के अर्बाब-ए-आग,
हम आप की मिज़ाज की पहचान बन गए

इन्सानियत की बात तो इतनी है शेख़ जी
बदक़िस्मती से आप भी इन्सान बन गए

काँटे बहुत थे दामन-ए-फ़ितरत में ऐ “अदम”
कुछ फूल और कुछ मेरे अरमान बन गए


18. ज़ख़्म दिल के अगर सिए होते

ज़ख़्म दिल के अगर सिए होते
अहल-ए-दिल किस तरह जिए होते

वो मिले भी तो इक झिझक सी रही
काश थोड़ी सी हम पिए होते

आरज़ू मुतमइन तो हो जाती
और भी कुछ सितम किए होते

लज़्ज़त-ए-ग़म तो बख़्श दी उस ने
हौसले भी 'अदम' दिए होते


19. ज़बाँ पर आप का नाम आ रहा था

ज़बाँ पर आप का नाम आ रहा था
ग़म-ए-हस्ती को आराम आ रहा था

ख़ुदा का शुक्र तेरी ज़ुल्फ़ बिखरी
बड़ी गर्मी का हंगाम आ रहा था

सितारे सो गए अंगड़ाई ले कर
कि अफ़्साने का अंजाम आ रहा था

तड़प कर मैं ने तौबा तोड़ डाली
तिरी रहमत पे इल्ज़ाम आ रहा था

'अदम' दिल खो के आसूदा नहीं हम
बुरा था या भला काम आ रहा था


20. ज़ुल्फ़-ए-बरहम सँभाल कर चलिए

ज़ुल्फ़-ए-बरहम सँभाल कर चलिए
रास्ता देख-भाल कर चलिए

मौसम-ए-गुल है अपनी बाँहों को
मेरी बाँहों में डाल कर चलिए

मय-कदे में न बैठिए ताहम
कुछ तबीअ'त बहाल कर चलिए

कुछ न देंगे तो क्या ज़ियाँ होगा
हर्ज क्या है सवाल कर चलिए

है अगर क़त्ल-ए-आम की निय्यत
जिस्म की छब निकाल कर चलिए

किसी नाज़ुक-बदन से टकरा कर
कोई कस्ब-ए-कमाल कर चलिए

या दुपट्टा न लीजिए सर पर
या दुपट्टा सँभाल कर चलिए

यार दोज़ख़ में हैं मुक़ीम 'अदम'
ख़ुल्द से इंतिक़ाल कर चलिए


21.  डाल कर कुछ तही प्यालों में

डाल कर कुछ तही प्यालों में
रंग भर दो मेरे ख़यालों में

ख्वाहिशें मर गईं ख़यालों में
पेच आया न उनके बालों में

उसने कोई जवाब ही न दिया
लोग उलझे रहे सवालों में

दैरो-काबे की बात मत पूछॊ
वाकि़यत गुम है इन मिसालों में

आज तक दिल में रौशनी है "अदम"
घिर गए थे परी जमालों में


22.  तकलीफ़ मिट गई मगर एहसास रह गया

तकलीफ़ मिट गई मगर एहसास रह गया
ख़ुश हूँ कि कुछ न कुछ तो मिरे पास रह गया

पल-भर में उस की शक्ल न आई अगर नज़र
यक-दम उलझ के रिश्ता-ए-अन्फ़ास रह गया

फोटो में दिल की चोट न तब्दील हो सकी
नक़लें उतार उतार के अक्कास रह गया

वो झूटे मोतियों की चमक पर फिसल गई
मैं हाथ में लिए हुए अल्मास रह गया

इक हम-सफ़र को खो के ये हालत हुई 'अदम'
जंगल में जिस तरह कोई बे-आस रह गया


23. तही सा जाम तो था गिर के बह गया होगा

तही सा जाम तो था गिर के बह गया होगा
मिरा नसीब अज़ल में ही रह गया होगा

है अहरमन से न मालूम क्यूँ ख़फ़ा यज़्दाँ
ग़रीब कोई खरी बात कह गया होगा

हम और लोग हैं हम से बहुत ग़ुरूर न कर
कलीम था जो तिरा नाज़ सह गया होगा

क़रीब-ए-का'बा पहुँच कर 'अदम' को मत ढूँडो
वो हीला-जू कहीं रस्ते में रह गया होगा


24.  तेरे दर पे वो आ ही जाते हैं

तेरे दर पे वो आ ही जाते हैं
जिन को पीने की आस है साक़ी

आज इतनी पिला दे आँखों से
ख़त्म रिन्दों की प्यास हो साक़ी

हल्का हल्का सुरूर है साक़ी
बात कोई ज़रूर है साक़ी

तेरी आँखें किसी को क्या देंगी
अपना अपना सुरूर है साक़ी

तेरी आँखों को कर दिया सजदा
मेरा पहला कुसूर है साक़ी

तेरे रुख़ पे ये परेशां ज़ुल्फें
इक अन्धेरे में नूर है साक़ी

पीने वालों को भी नहीं मालूम
मैकदा कितनी दूर है साक़ी


25. तौबा का तकल्लुफ़ कौन करे हालात की निय्यत ठीक नहीं

तौबा का तकल्लुफ़ कौन करे हालात की निय्यत ठीक नहीं
रहमत का इरादा बिगड़ा है बरसात की निय्यत ठीक नहीं

ऐ शम्अ बचाना दामन को इस्मत से मोहब्बत अर्ज़ां है
आलूदा-नज़र परवानों के जज़्बात की निय्यत ठीक नहीं

कल क़त्अ तअ'ल्लुक़ कर लेना इस वक़्त तो दुनिया मेरी है
ये रात की क़स्में झूटी हैं ये रात की निय्यत ठीक नहीं

ऐसा नज़र आता है जैसे ये शय मुझे पागल कर देगी
थोड़ी सी तवज्जोह बर-हक़ है बोहतात की निय्यत ठीक नहीं

रफ़्तार-ए-ज़माना का लहजा सफ़्फ़ाक दिखाई देता है
बर-वक़्त कोई तदबीर करो आफ़ात की निय्यत ठीक नहीं

मय-ख़ाने की रस्म-ओ-राह में भी हो जाए न शामिल खोट कहें
ख़ुद्दाम फ़रेब-आमादा हैं ख़िदमात की निय्यत ठीक नहीं

थोड़ा सा कड़ा गर दिल को करूँ आदात बदल तो सकती हैं
पर अस्ल मुसीबत तो ये है आदात की निय्यत ठीक नहीं

डरता हूँ 'अदम' फिर आज कहीं शो'ला न उठे बिजली न गिरे
बरबत की तबीअ'त उलझी है नग़्मात की निय्यत ठीक नही


26.  दरोग़ के इम्तिहाँ-कदे में सदा यही कारोबार होगा

दरोग़ के इम्तिहाँ-कदे में सदा यही कारोबार होगा
जो बढ़ के ताईद-ए-हक़ करेगा वही सज़ावार-ए-दार होगा

बिला-ग़रज़ सादा सादा बातों से डाल दें रस्म दोस्ती की
जो सिलसिला इस तरह चलेगा वो लाज़िमन पाएदार होगा

चलो मोहब्बत की बे-ख़ुदी के हसीन ख़ल्वत-कदे में बैठें
अजीब मसरूफ़ियत रहेगी न ग़ैर होगा न यार होगा

तिरे गुलिस्ताँ की आबरू है महक तिरी इन्फ़िरादियत की
तू कस्मपुर्सी से बुझ भी जाए तो ग़ैरत-ए-नौ-बहार होगा

जहाँ न तू हो न कोई हमदर्द हो न कोई शरीफ़ दुश्मन
मैं सोचता हूँ मुझे वो माहौल किस तरह साज़गार होगा

बहिश्त में भी जनाब-ए-ज़ाहिद तुम्हें न तरजीह मिल सकेगी
वहाँ भी ख़ुश-ज़ौक़ आसियों का तपाक से इंतिज़ार होगा

'अदम' की शब-ख़ेज़ियों के अहवाल यूँ सुनाते हैं उस के महरम
कि सुनने वाले ये मान जाएँ कोई तहज्जुद-गुज़ार होगा


27.  दिल डूब न जाएँ प्यासों के तकलीफ़ ज़रा फ़रमा देना

दिल डूब न जाएँ प्यासों के तकलीफ़ ज़रा फ़रमा देना
ऐ दोस्त किसी मय-ख़ाने से कुछ ज़ीस्त का पानी ला देना

तूफ़ान-ए-हवादिस से प्यारे क्यूँ इतना परेशाँ होता है
आसार अगर अच्छे न हुए इक साग़र-ए-मय छलका देना

ज़ुल्मात के झुरमुट वैसे तो बिजली की चमक से डरते हैं
पर बात अगर कुछ बढ़ जाए तारों से सुबू टकरा देना

हम हश्र में आते तो उन की तश्हीर का बाइ'स हो जाते
तश्हीर से बचने वालों को ये बात ज़रा समझा देना

मैं पैरहन-ए-हस्ती में बहुत उर्यां सा दिखाई देता हूँ
ऐ मौत मिरी उर्यानी को मल्बूस-ए-'अदम' पहना देना


28.  दिल को दिल से काम रहेगा

दिल को दिल से काम रहेगा
दोनों तरफ़ आराम रहेगा

सुब्ह का तारा पूछ रहा है
कब तक दौर-ए-जाम रहेगा

बदनामी से क्यूँ डरते हो
बाक़ी किस का नाम रहेगा

ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ ही अच्छी है
आलम ज़ेर-ए-दाम रहेगा

मुफ़्ती से झगड़ा न 'अदम' कर
उस से अक्सर काम रहेगा


29.  दिल है बड़ी ख़ुशी से इसे पाएमाल कर

दिल है बड़ी ख़ुशी से इसे पाएमाल कर
लेकिन तिरे निसार ज़रा देख-भाल कर

इतना तो दिल-फ़रेब न था दाम-ए-ज़िंदगी
ले आए ए'तिबार के साँचे में ढाल कर

साक़ी मिरे ख़ुलूस की शिद्दत को देखना
फिर आ गया हूँ गर्दिश-ए-दौराँ को टाल कर

ऐ दोस्त तेरी ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की ख़ैर हो
मेरी तबाहियों का न इतना ख़याल कर

आया हूँ यूँ बचा के हवादिस से ज़ीस्त को
लाते हैं जैसे कोह से चश्मा निकाल कर

थोड़े से फ़ासले में भी हाएल हैं लग़्ज़िशें
साक़ी सँभाल कर मिरे साक़ी सँभाल कर

हम से 'अदम' छुपाओ तो ख़ुद भी न पी सको
रक्खा है तुम ने कुछ तो सुराही में डाल कर


30. दुआएँ दे के जो दुश्नाम लेते रहते हैं

दुआएँ दे के जो दुश्नाम लेते रहते हैं
वो जाम देते हैं और जाम लेते रहते हैं

ख़फ़ा न हो कि हमारा क़ुसूर कोई नहीं
बिला-इरादा तिरा नाम लेते रहते हैं

हुजूम-ए-ग़म में तिरा नाम भूल भी जाए
तो फिर भी जैसे तिरा नाम लेते रहते हैं

ये नाम ऐसा है बिल्कुल ही गर न लें उस को
तो फिर भी हम सहर-ओ-शाम लेते रहते हैं

तिरी निगाह का क्या क़र्ज़ हम उतारेंगे
तिरी नज़र से बड़े काम लेते रहते हैं

मैं वो मुसाफ़िर-ए-रौशन-ख़याल हूँ यारो
जो रास्ते में भी आराम लेते रहते हैं

ग़म-ए-हयात की तालीम-ओ-तर्बियत के लिए
तिरी निगाह के अहकाम लेते रहते हैं

पड़ी है यूँ हमें बद-नामियों की चाट 'अदम'
कि मुस्कुरा के हर इल्ज़ाम लेते रहते हैं


31. देख कर दिल-कशी ज़माने की

देख कर दिल-कशी ज़माने की
आरज़ू है फ़रेब खाने की

ऐ ग़म-ए-ज़िंदगी न हो नाराज़
मुझ को आदत है मुस्कुराने की

ज़ुल्मतों से न डर कि रस्ते में
रौशनी है शराब-ख़ाने की

आ तिरे गेसुओं को प्यार करूँ
रात है मिशअलें जलाने की

किस ने साग़र 'अदम' बुलंद किया
थम गईं गर्दिशें ज़माने की


32. फूलों की आरज़ू में बड़े ज़ख़्म खाये हैं

फूलों की आरज़ू में बड़े ज़ख़्म खाये हैं
लेकिन चमन के ख़ार भी अब तक पराये हैं

उस पर हराम है ग़म-ए-दौराँ की तल्ख़ियाँ
जिसके नसीब में तेरी ज़ुल्फ़ों के साये हैं

महशर में ले गैइ थी तबियत की सादगी
लेकिन बड़े ख़ुलूस से हम लौट आये हैं

आया हूँ याद बाद-ए-फ़ना उनको भी 'अदम
क्या जल्द मेरे सीख पे इमान लाये हैं


33. फूलों की टहनियों पे नशेमन बनाइये

फूलों की टहनियों पे नशेमन बनाइये
बिजली गिरे तो जश्ने-चिरागां मनाइये

कलियों के अंग अंग में मीठा सा दर्द है
बिमार निकाहतों को ज़रा गुदगुदाइये

कब से सुलग रही है जवानी की गर्म रात
ज़ुल्फें बिखेर कर मेरे पहलू में आईये

बहकी हुई सियाह घटाओं के साथ साथ
जी चाहता है शाम-ए-अबद तक तो जाईये

सुन कर जिस हवास में ठंडक सी आ बसे
ऐसी काई उदास कहानी सुनाईये

रस्ते पे हर कदम पे ख़राबात हैं ”अदम”
ये हाल हो तो किस तरह दामन बचाईये


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