अब्दुल हमीद अदम, abdul hameed adam ki ghazale

Ghazal/Ghazals Abdul Hameed Adam

ग़ज़ल/ग़ज़लें अब्दुल हमीद अदम

1. अगरचे रोज़-ए-अज़ल भी यही अँधेरा था

अगरचे रोज़-ए-अज़ल भी यही अँधेरा था
तिरी जबीं से निकलता हुआ सवेरा था

पहुँच सका न मैं बर-वक़्त अपनी मंज़िल पर
कि रास्ते में मुझे रहबरों ने घेरा था

तिरी निगाह ने थोड़ी सी रौशनी कर दी
वगर्ना अर्सा-ए-कौनैन में अँधेरा था

ये काएनात और इतनी शराब-आलूदा
किसी ने अपना ख़ुमार-ए-नज़र बिखेरा था

सितारे करते हैं अब उस गली के गिर्द तवाफ़
जहाँ 'अदम' मिरे महबूब का बसेरा था


2. अपनी ज़ुल्फों को सितारों के हवाले कर दो

अपनी ज़ुल्फों को सितारों के हवाले कर दो
शहर-ए-गुल बादा गुसारों के हवाले कर दो

तल्ख़ी-ए-होश हो या मस्ती-ए-इदराक-ए-जनूं
आज हर चीज़ बहारों के हवाले कर दो

मुझको यारो ना करो राह-नुमांओं के सपुर्द
मुझको तुम राह-गुज़ारों के हवाले कर दो

जागने वालों का तूफ़ां से कर दो रिश्ता
सोने वालों को किनारों के हवाले कर दो

मेरी तौबा का बजा है यही एजाज़ “अदम”
मेरा साग़र मेरे यारों के हवाले कर दो


3. अब दो-आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे

अब दो-आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे
दिल की आहट से तिरी आवाज़ आती है मुझे

झाड़ कर गर्द-ए-ग़म-ए-हस्ती को उड़ जाऊँगा मैं
बे-ख़बर ऐसी भी इक पर्वाज़ आती है मुझे

या समाअ'त का भरम है या किसी नग़्मे की गूँज
एक पहचानी हुई आवाज़ आती है मुझे

किस ने खोला है हवा में गेसुओं को नाज़ से
नर्म-रौ बरसात की आवाज़ आती है मुझे

उस की नाज़ुक उँगलियों को देख कर अक्सर 'अदम'
एक हल्की सी सदा-ए-साज़ आती है मुझे


5. अरे मय-गुसारो सवेरे सवेरे

अरे मय-गुसारो सवेरे सवेरे
ख़राबात के गिर्द फेरे पे फेरे

बड़ी रौशनी बख़्शते हैं नज़र को
तेरे गेसुओं के मुक़द्दस अँधेरे

किसी दिन इधर से गुज़र कर तो देखो
बड़ी रौनक़ें हैं फ़क़ीरों के डेरे

ग़म-ए-ज़िंदगी को 'अदम' साथ ले कर
कहाँ जा रहे हो सवेरे सवेरे


6. आगही में इक ख़ला मौजूद है

आगही में इक ख़ला मौजूद है
इस का मतलब है ख़ुदा मौजूद है

है यक़ीनन कुछ मगर वाज़ेह नहीं
आप की आँखों में क्या मौजूद है

बाँकपन में और कोई शय नहीं
सादगी की इंतिहा मौजूद है

है मुकम्मल बादशाही की दलील
घर में गर इक बोरिया मौजूद है

शौक़िया कोई नहीं होता ग़लत
इस में कुछ तेरी रज़ा मौजूद है

इस लिए तन्हा हूँ मैं गर्म-ए-सफ़र
क़ाफ़िले में रहनुमा मौजूद है

हर मोहब्बत की बिना है चाशनी
हर लगन में मुद्दआ' मौजूद है

हर जगह हर शहर हर इक़्लीम में
धूम है उस की जो ना-मौजूद है

जिस से छुपना चाहता हूँ मैं 'अदम'
वो सितमगर जा-ब-जा मौजूद है


7. आज फिर रूह में इक बर्क़ सी लहराती है

आज फिर रूह में इक बर्क़ सी लहराती है
दिल की गहराई से रोने की सदा आती है

यूँ चटकती हैं ख़राबात में जैसे कलियाँ
तिश्नगी साग़र-ए-लबरेज़ से टकराती है

शोला-ए-ग़म की लपक और मिरा नाज़ुक सा मिज़ाज
मुझ को फ़ितरत के रवय्ये पे हँसी आती है

मौत इक अम्र-ए-मुसल्लम है तो फिर ऐ साक़ी
रूह क्यूँ ज़ीस्त के आलाम से घबराती है

सो भी जा ऐ दिल-ए-मजरूह बहुत रात गई
अब तो रह रह के सितारों को भी नींद आती है

और तो दिल को नहीं है कोई तकलीफ़ 'अदम'
हाँ ज़रा नब्ज़ किसी वक़्त ठहर जाती है



8. आता है कौन दर्द के मारों के शहर में

आता है कौन दर्द के मारों के शहर में
रहते हैं लोग चाँद सितारों के शहर में

मिलता तो है ख़ुशी की हक़ीक़त का कुछ सुराग़
लेकिन नज़र-फ़रेब इशारों के शहर में

उन अँखड़ियों को देख के होता है ये गुमाँ
हम आ बसे हैं बादा-गुसारों के शहर में

ऐ दिल तिरे ख़ुलूस के सदक़े! ज़रा सा होश
दुश्मन भी बे-शुमार हैं यारों के शहर में

देखें 'अदम' नसीब में है क्या लिखा हुआ
दिल बेचने चले हैं निगारों के शहर में


9. आप अगर हमको मिल गये होते

आप अगर हमको मिल गये होते
बाग़ में फूल खिल गये होते

आप ने यूँ ही घूर कर देखा
होंठ तो यूँ भी सिल गये होते

काश हम आप इस तरह मिलते
जैसे दो वक़्त मिल गये होते

हमको अहल-ए-ख़िरद मिले ही नहीं
वरना कुछ मुन्फ़ईल गये होते

उसकी आँखें ही कज-नज़र थीं 'अदम'
दिल के पर्दे तो हिल गये होते


10. आँखों से तिरी ज़ुल्फ़ का साया नहीं जाता

आँखों से तिरी ज़ुल्फ़ का साया नहीं जाता
आराम जो देखा है भुलाया नहीं जाता

अल्लाह-रे नादान जवानी की उमंगें!
जैसे कोई बाज़ार सजाया नहीं जाता

आँखों से पिलाते रहो साग़र में न डालो
अब हम से कोई जाम उठाया नहीं जाता

बोले कोई हँस कर तो छिड़क देते हैं जाँ भी
लेकिन कोई रूठे तो मनाया नहीं जाता

जिस तार को छेड़ें वही फ़रियाद-ब-लब है
अब हम से 'अदम' साज़ बजाया नहीं जाता


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